जनता के काम करने को प्रशासन, बिना काम के लाखों डकारने को नगरपालिका के जिम्मेदार!

भ्रष्टाचार में डूबी नपा के जिम्मेदारों की नहीं सुनते कर्मचारी, हर बार कलेक्टर के हस्तक्षेप से सुलझ रहे मामले
शिवपुरी। नगरपालिका एक स्वायत्ती संस्था (ऑटोनॉमी बॉडी) है, जिसे नगर की सरकार भी कहते हैं। शिवपुरी की नगरपालिका सिर्फ बिना काम के लाखों डकारने के लिए बनी है, जबकि जनहित का जब भी कोई मुद्दा उलझता है तो वो कलेक्टर के हस्तक्षेप से ही सुलझ पाता है। फिर चाहे नपा के सफाईकर्मियों की हड़ताल हो या पानी सप्लाई के पंप खराब होने का मामला हो।
गौरतलब है कि बीते 25 अगस्त से शुरू हुई नगरपालिका के सफाईकर्मियों की हड़ताल 31 अगस्त को आधे दिन तक चली। नपाध्यक्ष एवं सीएमओ ने आश्वासन की पुड़िया देने से लेकर नौकरी से हटा देने की धमकी तक दी, लेकिन हड़ताली कर्मचारी काम पर वापस नहीं लौटे। इस दौरान रक्षाबंधन का पर्व भी गंदे शहर में ही मन गया, तथा बाहर से आईं बहनों के अलावा रिश्तेदार भी शिवपुरी के नाम पर एक गंदे शहर का मेसेज लेकर गए।
31 अगस्त को कलेक्टर अर्पित वर्मा ने इस मामले में हस्तक्षेप किया तथा कर्मचारियों को यह भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों पर 7 दिन में काम किया जाएगा, तब हड़ताल सात दिन के लिए स्थगित करके सफाईकर्मी काम पर लौट तथा शहर में सफाई का कार्य शुरू किया गया। ज्ञात रहे कि इससे पूर्व भी जब भीषण गर्मी के बीच सिंध जलावर्धन योजना की सप्लाई ठप हो गई थी, तथा सतनबाड़ा फ़िल्टर प्लांट पर मशीनें खराब होने की बात कहकर नपा के जिम्मेदार पल्ला झाड़ रहे थे, तब भी कलेक्टर वर्मा ने फिल्टर प्लांट पहुंचकर मशीनों को सुधारने के निर्देश दिए तो अगले दिन से सप्लाई शुरू हो गई थी। ऐसे हालातों के बीच बड़ा सवाल यह भी है कि जब नगर की सरकार का संचालन प्रशासन को ही करना है तो फिर नपाध्यक्ष एवं सीएमओ सहित अन्य पदाधिकारियों की जरूरत क्या है?, क्या यह लोग शहर विकास के लिए आई राशि में से अपनी जेब भरने के लिए कुर्सियों पर विराजमान हैं?, क्या इनका काम सिर्फ लूट- खसोट करने का ही है। नपा के पूर्व सीएमओ इशांक धाकड़ ने तो कर्मचारियों को सस्पेंड करके बहाल करने के नाम पर वसूली का धंधा बना रखा था, तथा ऐसे ही एक मामले में वो लोकायुक्त में सह आरोपी बना हुआ है।
इसलिए नहीं सुनते कर्मचारी इनकी बात:
नपा के सफाई कर्मचारी से लेकर अन्य शाखा के कर्मचारियों को पता है कि अध्यक्ष से लेकर सीएमओ तक तथा अन्य पदाधिकारी किस तरह से शहर विकास की राशि से अपना घर भर रहे हैं। उनके सामने तो ऐसे कई मामले उजागर हैं जिनमें बिना काम के अथवा काम 10 लाख का तथा भुगतान 30 लाख का करके हिस्सेदारी की गई। चूंकि कर्मचारियों के सामने इन सभी सफेदपोशों के चेहरे उजागर हैं, इसलिए वो इनकी नहीं सुनते।




















